सोने की चिडिया कहलाये जाने वाला हमारा भारत वर्ष कितने ही जन्मों तक विदेशी आक्रमनकारियो की क्रूरता सहता रहा है. हमारी कितनी ही पीढिया विदेशी आक्रमनकारियो की गुलाम बन कर रही हैं. अपनी संस्कृति और सभ्यता को कितनी ही बार खो चुकी ये धरती आज ६० बरस से ऊपर की अपनी आज़ादी को सहेज कर रखने के लिए प्रयासरत है. हमारी भारत भूमि आज भी प्रयासरत है अपने गौरव को विदेशी ताकतों से बचाने के लिए.
आज हम आजाद भारत के आजाद नागरिक हैं. हमारे पास वे सभी मूल-भूत सुविधाए हैं जो की किसी भी विकास-शील देश में होनी चाहिए. हमारे पास हर वो स्वंत्रता है जो की किसी भी स्वतंत्र देश में होनी चाहिए. परन्तु, क्या हम सच में आजाद हैं? क्या हमारी सोच आज भी गुलामी की जंजीरों से बंधी हुई नहीं है? मुझे आश्चर्य होगा यदि आप में से कोई भी इस बात से सहमत नहीं हुआ तो. और जो नहीं हुए, उनके लिए मैं आगे लिखने जा रहा हूँ. कृपया ध्यान दीजियेगा और अपना मत रखियेगा.
आज, लोक-तंत्र के नाम पर हमारे पास वो सब कुछ है जो हमे एक सुखी जीवन जीने के लिए चाहिए. हम अपनी आज़ादी का भरपूर फायदा उठा रहे हैं. मानता हूँ. लेकिन जब तब हमारी इस आज़ादी को कायम रखने के लिए हमे कुछ अलग कर दिखाना होता है. कुछ ऐसा जो की हमने अपने जीवन में तो कभी नहीं किया, पर हाँ, हमारे पूर्वजो ने ज़रूर हमे आज़ादी दिलाने के लिए वह किया होगा. जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ क्रान्ति या इन्कलाब लाने की. क्रान्ति इसीलिये क्यूंकि जब तब हमारे समाज में कुछ ऐसे प्रशन उठाये जाते हैं जिनका जवाब केवल और केवल क्रान्ति ही है. परन्तु यहाँ मैं मार-धाड़ वाली क्रान्ति की बात नहीं कर रहा. मैं बात कर रहा हूँ एक शान्ति-पूर्ण रूप से अपना विरोध प्रकट करने की. क्या हम ये काम कर सकते हैं? जी नहीं, मैं एक झुंड की या गुट में जाने के लिए नहीं बोल रहा. क्या हम अकेले किसी क्रान्ति का आरम्भ कर सकते हैं? ज़रा सोचिये.
जी हाँ, ऐसा ही है. जब भी हमे किसी ऐसी जगह पर अपना विरोध प्रकट करने का मौका मिलता है जहाँ हमारे ही समाज के लोगो या हमारे ऊपर राज करने वाले नेताओं या अधिकारियो द्बारा नियमो के विपरीत जाके कुछ काम किया जाता है, वहां हमे क्यों अपने लिए भी किसी नेता की ज़रुरत पड़ती है? क्यों हम अकेले ही अपनी ज़रूरतों के लिए नहीं खड़े हो सकते? और एक नेता के आने के बाद भी जब कभी पुलिस द्बारा लाठी-चार्ज किया जाता है तो वहां भी हम सबको छोड़ कर दम दबा कर भाग खड़े होते हैं. नहीं तो कहीं कोने में छुप कर उस सब की फोटो खींच कर उसे मीडिया वालो को देने की सोच रहे होते हैं. क्यों ऐसा है?
कितनी ही बार ऐसा होता है कि हमे अपने जीवन में ऐसे क्रिया-कलाप देखने को मिलते हैं जिनका विरोध हम करना चाहते हैं परन्तु ये सोच कर अपने आप को रोक लेते हैं कि जाने दो यार, अपना क्या जाता है या फिर कि क्यों फंसे इस झमेले में. कितनी ही बार हमारे सामने किसी लड़की से छेड़-छाड़ की जा रही होती है परन्तु हम नपुंसको की तरह सब कुछ चुप-चाप देखते रहते हैं और राह देखते हैं किसी ऐसे व्यक्ति की जो आगे आ कर हमारा नेतृत्व करे. कितनी ही बार हमारे सामने कोई दुर्घटना का शिकार रास्ते में पड़ा तड़प रहा होता है, परन्तु हम केवल एक मूक दर्शक बन कर खड़े रहते हैं और राह देखते हैं किसी ऐसे व्यक्ति कि जो कि आ कर हमारे सोये ज़मीर को जगाये. कितनी ही बार हमारे सामने दहेज़ के लोभी जिंदा जला देते हैं हमारी बहनों को, परन्तु हम अपने आँख और कान बंद किये राह देखते हैं किसी ऐसे व्यक्ति की जो पुलिस को बुलाए. कितनी ही बार हमारे सामने किसी बुजुर्ग से उनके पैसे चीन लिए जाते हैं परन्तु हम कुछ और करने की बजाये वही करते हैं, किसी और की राह देखना. कितनी ही बार हमारे सामने किसी मजबूर को पैरो तले रौंदा जाता है, परन्तु हम राह देखते हैं किसी ऐसे व्यक्ति की जो हमारे अन्दर के जानवर को मार कर सोये हुए इंसान को जगाये.
हम आजाद हैं. जी हाँ, ये आज़ादी ही तो है जिसकी बदौलत हम आज खुले-आम नाजायज़ काम होते देख सकते हैं. जी हाँ, ये आज़ादी ही तो ये जिसकी वजह से हम आज स्वंत्रता-पूर्ण विचरण करते हैं कहीं भी और कभी भी. परन्तु याद रखिये, हमे कभी ना कभी तो जागना ही होगा. अपनी इस डरपोक सोच की गुलामी को छोड़ कर एक नयी सोच के साथ नया सवेरा देखने को.
तो आइये, आज हम सब प्रण लें, कि जब कभी हम किसी मजलूम पर अत्याचार होता देखेंगे, हम आगे आयेंगे. जी नहीं, इस बार किसी की राह देखने के लिए नहीं, बल्कि उस अत्याचार को मिटाने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करने को. आइये, हम सब प्रण लें कि जब कभी किसी दुर्घटना के शिकार को देखेंगे तो उसे जल्द से जल्द हस्पताल पहुंचाएंगे.
आइये, हम सब प्रण लें कि हम एक नया भारत बनायेंगे.
जय भारत जय हिंद
आज हम आजाद भारत के आजाद नागरिक हैं. हमारे पास वे सभी मूल-भूत सुविधाए हैं जो की किसी भी विकास-शील देश में होनी चाहिए. हमारे पास हर वो स्वंत्रता है जो की किसी भी स्वतंत्र देश में होनी चाहिए. परन्तु, क्या हम सच में आजाद हैं? क्या हमारी सोच आज भी गुलामी की जंजीरों से बंधी हुई नहीं है? मुझे आश्चर्य होगा यदि आप में से कोई भी इस बात से सहमत नहीं हुआ तो. और जो नहीं हुए, उनके लिए मैं आगे लिखने जा रहा हूँ. कृपया ध्यान दीजियेगा और अपना मत रखियेगा.
आज, लोक-तंत्र के नाम पर हमारे पास वो सब कुछ है जो हमे एक सुखी जीवन जीने के लिए चाहिए. हम अपनी आज़ादी का भरपूर फायदा उठा रहे हैं. मानता हूँ. लेकिन जब तब हमारी इस आज़ादी को कायम रखने के लिए हमे कुछ अलग कर दिखाना होता है. कुछ ऐसा जो की हमने अपने जीवन में तो कभी नहीं किया, पर हाँ, हमारे पूर्वजो ने ज़रूर हमे आज़ादी दिलाने के लिए वह किया होगा. जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ क्रान्ति या इन्कलाब लाने की. क्रान्ति इसीलिये क्यूंकि जब तब हमारे समाज में कुछ ऐसे प्रशन उठाये जाते हैं जिनका जवाब केवल और केवल क्रान्ति ही है. परन्तु यहाँ मैं मार-धाड़ वाली क्रान्ति की बात नहीं कर रहा. मैं बात कर रहा हूँ एक शान्ति-पूर्ण रूप से अपना विरोध प्रकट करने की. क्या हम ये काम कर सकते हैं? जी नहीं, मैं एक झुंड की या गुट में जाने के लिए नहीं बोल रहा. क्या हम अकेले किसी क्रान्ति का आरम्भ कर सकते हैं? ज़रा सोचिये.
जी हाँ, ऐसा ही है. जब भी हमे किसी ऐसी जगह पर अपना विरोध प्रकट करने का मौका मिलता है जहाँ हमारे ही समाज के लोगो या हमारे ऊपर राज करने वाले नेताओं या अधिकारियो द्बारा नियमो के विपरीत जाके कुछ काम किया जाता है, वहां हमे क्यों अपने लिए भी किसी नेता की ज़रुरत पड़ती है? क्यों हम अकेले ही अपनी ज़रूरतों के लिए नहीं खड़े हो सकते? और एक नेता के आने के बाद भी जब कभी पुलिस द्बारा लाठी-चार्ज किया जाता है तो वहां भी हम सबको छोड़ कर दम दबा कर भाग खड़े होते हैं. नहीं तो कहीं कोने में छुप कर उस सब की फोटो खींच कर उसे मीडिया वालो को देने की सोच रहे होते हैं. क्यों ऐसा है?
कितनी ही बार ऐसा होता है कि हमे अपने जीवन में ऐसे क्रिया-कलाप देखने को मिलते हैं जिनका विरोध हम करना चाहते हैं परन्तु ये सोच कर अपने आप को रोक लेते हैं कि जाने दो यार, अपना क्या जाता है या फिर कि क्यों फंसे इस झमेले में. कितनी ही बार हमारे सामने किसी लड़की से छेड़-छाड़ की जा रही होती है परन्तु हम नपुंसको की तरह सब कुछ चुप-चाप देखते रहते हैं और राह देखते हैं किसी ऐसे व्यक्ति की जो आगे आ कर हमारा नेतृत्व करे. कितनी ही बार हमारे सामने कोई दुर्घटना का शिकार रास्ते में पड़ा तड़प रहा होता है, परन्तु हम केवल एक मूक दर्शक बन कर खड़े रहते हैं और राह देखते हैं किसी ऐसे व्यक्ति कि जो कि आ कर हमारे सोये ज़मीर को जगाये. कितनी ही बार हमारे सामने दहेज़ के लोभी जिंदा जला देते हैं हमारी बहनों को, परन्तु हम अपने आँख और कान बंद किये राह देखते हैं किसी ऐसे व्यक्ति की जो पुलिस को बुलाए. कितनी ही बार हमारे सामने किसी बुजुर्ग से उनके पैसे चीन लिए जाते हैं परन्तु हम कुछ और करने की बजाये वही करते हैं, किसी और की राह देखना. कितनी ही बार हमारे सामने किसी मजबूर को पैरो तले रौंदा जाता है, परन्तु हम राह देखते हैं किसी ऐसे व्यक्ति की जो हमारे अन्दर के जानवर को मार कर सोये हुए इंसान को जगाये.
हम आजाद हैं. जी हाँ, ये आज़ादी ही तो है जिसकी बदौलत हम आज खुले-आम नाजायज़ काम होते देख सकते हैं. जी हाँ, ये आज़ादी ही तो ये जिसकी वजह से हम आज स्वंत्रता-पूर्ण विचरण करते हैं कहीं भी और कभी भी. परन्तु याद रखिये, हमे कभी ना कभी तो जागना ही होगा. अपनी इस डरपोक सोच की गुलामी को छोड़ कर एक नयी सोच के साथ नया सवेरा देखने को.
तो आइये, आज हम सब प्रण लें, कि जब कभी हम किसी मजलूम पर अत्याचार होता देखेंगे, हम आगे आयेंगे. जी नहीं, इस बार किसी की राह देखने के लिए नहीं, बल्कि उस अत्याचार को मिटाने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करने को. आइये, हम सब प्रण लें कि जब कभी किसी दुर्घटना के शिकार को देखेंगे तो उसे जल्द से जल्द हस्पताल पहुंचाएंगे.
आइये, हम सब प्रण लें कि हम एक नया भारत बनायेंगे.
जय भारत जय हिंद

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